Tuesday, December 30, 2014

महामीठो रस प्रेम को

चारो तरफ पसरा सन्नाटा ,
तुम जाने कहा खो गयी, यकीन नहीं आता
कोई डोर छूटी, तो कोई बुलबुला फूटा
अचानक कुछ अजीब-सा यहाँ घटा,
भीतर कुछ टूट-सा गया
की जैसे अचानक से बिन चाहे पिस्तौल से गोली चल जाये,
और, बगल में तुम्हे सहलाते खड़ी हो कोई कमसिन प्रेयसि,
की एकदम खून का फव्वारा फुट पड़े
कुछ देर तो सिर्फ लाल रंग लहू का नज़र आये,
न देखने की हिम्मत , की लहू किसका है
और न जानने की कोई अभिलाषा, की
मौन कौन हुआ है,
जैसे की कोई अनचाही समाधी बेवक़्त ही लग गयी हो
अनायास ही कोई घटना घट गयी हो
कोई तो अवश्य जागा  है,
जब ही तो तुम्हारी गोद में कोई खामोश लेटा है ,
लहू से सने तुम्हारे हाथ है,
लाल उंगलिया अवश्य ही केशो को सहला रही होंगी,
कोई प्यारा सा इंसान, जो तुम्हे बहुत करता था प्यार ,
 आँखे बंद किये, ठंडे शरीर में
निस्तेज सोया है, की जैसे कोई चिरनिद्रा में जाता हो।

तुम भी तो चुपचाप बैठे हो, ठिठक कर, एकदम मौन
की जैसे इन्द्रियों की शवयात्रा हो, और कोई योगी विजय मुद्रा में,
शिवालीन होकर एक दम तारो ताजा खड़ा है।  
अवश्य ही देवता फूल बरसा रहे होंगे,
बुद्ध को जब ज्ञान मिला था, तब भी गुलाब के फूलो की वर्षा हुई थी,
ये कैसा अनुभव है, कैसा विचित्र दृश्य है,
एक क्षण तो कोई ध्यानस्थ योगी नजर आता है,
और ठीक दुसरे ही क्षण तुम्हारी प्रेयसि का शव नज़र आता है ,
खून अभी तक बह रहा है, अब कुछ-कुछ ठंडा पड़ने लगा है ,
वह जो कुछ देर पहले सजती थी, इठलाति थी , तुम्हारे केशो को सहलाती थी
और न जाने कैसे भिन्न-भिन्न मुद्राओ में मुस्कुराती थी,
की बस अब कोई कामना ही नहीं, किसी सुख की
साक्षात काम का चरम सुख, तुम्हारी आत्मा को सुशोभित करता था
और तुम्हारी प्रेयसि के वक्षस्थल में ब्रह्मांडा शायद सुप्त अवस्था में,
अपने तमाम सुखो के साथ रहता था,
उसकी नाभि से सदा सोमरस की धारा निकलती थी,
और, तुम खूब करते थे उसका रसपान; कामानन्द में करते थे अंतर्स्नान।
अपनी प्रेयसि के अधोवस्त्रों में साक्षात करते थे शिव का दर्शन ,
की जैसे जीवन के महाध्यान का कामुक प्रयोग हो,
की ये क्या,
एक क्षण में सब  कल्पना मात्र  रह गया,
रह गया, किसी कवि का निर्मम ह्रदय और हो गयी प्रकट फिर से, एक फूहड़ कविता,
जिसमे वही शब्द, वही जड़ विचार, कोई नूतन नहीं
और वही शब्दों का मयाजा।

कुछ तो कहना होगा अंत में,
लेकिन ऐसा है की, हर बात का अंत नहीं होता ,
मेरा और तुम्हारा मिलन मात्र एक जनम मे नहीं होता,
कुछ तो है, जो है कालातीत,
परन्तु,
मुझे अपनी प्रेयसि से अलग होने का बड़ा दुख है,
ऐसे ही कुछ निर्बल क्षणों में,
वेदना के अंतहीन, बियाबान जंगलो में,
मैंने अक्सर परमात्मा को पुकारा है,
और, बुद्ध हो जाने का संकल्प अनेको बार दोहराया है।
किन्तु हर बार, तुम आई हो रूपा,
मुझे खीच लाने, की चलो संसार में सुख बहुत है शेष,
काम अभी करने है बहुत,
जीवन के संघर्ष, चोर, लुटेरे और राजनेता तुम्हे फिर से बुलाते है,
समाधी की चिंता छोड़, चलो मेरे साथ।
मैं ही कुण्डलिनी हूँ, सदा से तुम्हारे भीतर हूँ ,
इन काले जंगलो में तुम्हारा नहीं कोई काम,
मेरे सुन्दर नेत्रों और कामुक आलिंगन में ही, है तुम्हारा निर्वाण,
आओ मुझसे प्रेम करो, प्रेम ही ब्रह्म है, प्रेम ही परमात्मा है,
कोई और नहीं, मैं ही हिमालयपुत्री पारवती हूँ,
और तुम ही मेरे शिव हो,

कुछ और नहीं कहना मुझे ,
की बस, बात यही है की,
भीतर ही है समाधान,
चिरस्थायी वेदो का महाज्ञान।

चलो, शीग्र ही पकड़ो मेरा हाथ,
चूम लो मेरे नेत्र,
और करो,
महाप्रेम में अंतर्स्नान,
महाप्रेम में अंतर्स्नान
महाप्रेम में अंतरस्नान

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